नर्मदापुरम । मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि पौराणिक कथाओं और लोककथाओं का जीवंत प्रमाण भी माना जाता है।इटारसी से केवल 18 किलोमीटर दूर, सतपुड़ा की इन पहाड़ियों में स्थित यह प्राचीन गुफा मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यहाँ विराजमान शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और सिंदूर अर्पित किया जाता है, जो इसे पूरे विश्व में अद्वितीय बनाता है।श्रद्धालुओं की मान्यता है कि जब भस्मासुर ने भगवान शंकर का पीछा किया, तब भोलेनाथ ने इन गुफाओं में शरण ली थी। यही कारण है कि यह स्थान आस्था और रहस्य का संगम बन गया है। लोककथाओं के अनुसार भगवान शंकर ने यहां कई दिनों तक समय व्यतीत किया और पचमढ़ी तक जाने के लिए सुरंग बनाई, जिसे आज भी श्रद्धालु ‘जटाशंकर धाम’ से जोड़कर देखते हैं। आज हम आपको लेकर चलेंगे इस प्राचीन शिवालय की ओर, जहाँ इतिहास, रहस्य और भक्ति एक साथ जीवंत नजर आते हैं। आइए जानते हैं, क्या है इस ‘तिलक सिंदूर’ शिवधाम की खासियत और क्यों इसे भक्तजन और शोधकर्ता समान रूप से महत्व देते हैं।

सतपुड़ा में विराजमान तिलक सिंदूर शिवधामभस्मासुर की कथा और भगवान शंकर की शरण ओंकारेश्वर के समकालीन प्राचीन शिवलिंगजल, दूध, बेलपत्र और सिंदूर से अनोखा अभिषेकनंदी प्रतिमा और सिद्ध पुरुषों की तपोस्थलीधार्मिक आस्था और पर्यटन का प्रमुख केंद्रसतपुड़ा की हरी-भरी वादियों में बसा ‘तिलक सिंदूर’ शिवधाम न केवल श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है, बल्कि पौराणिक कथाओं और लोककथाओं का जीवंत प्रमाण भी है। इस प्राचीन गुफा मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है। मान्यता है कि जब भस्मासुर ने भगवान शंकर का पीछा किया, तब भोलेनाथ ने इस पहाड़ी की गुफा में शरण ली थी।किवदंतियों के अनुसार, कई दिनों तक छिपने के बाद भगवान शंकर ने पचमढ़ी जाने के लिए सुरंग बनाई, जो आगे चलकर जटाशंकर धाम तक जाती है। इस कारण जटाशंकर धाम को शिवजी का दूसरा घर भी कहा जाता है। यही नहीं, गणेश जी ने इस स्थान पर राक्षस सिंदूर का वध किया और उसके सिंदूरी रक्त से भगवान शंकर का अभिषेक किया था।यहां का शिवलिंग अत्यंत प्राचीन और अद्वितीय है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के समकालीन माना जाने वाला यह शिवलिंग पूरे देश में एकमात्र ऐसा स्थल है, जहाँ जल, दूध, बेलपत्र और सिंदूर एक साथ चढ़ाया जाता है।इस शिवलिंग की जलहरी चतुष्कोणीय है, जो इसे अन्य शिवालयों से अलग बनाती है, क्योंकि सामान्यतः अन्य शिवलिंगों में त्रिकोणीय जलहरी देखने को मिलती है। यहाँ का जल पश्चिम दिशा की ओर बहता है, जो इसे और भी विशेष बनाता है।

श्रद्धालु कहते हैं कि यहां होने वाले अभिषेक, पूजा और सिंदूर चढ़ाने की परंपरा उन्हें आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद प्रदान करती है। नंदी पर विराजमान भगवान शंकर की अनोखी प्रतिमा भी देश में अद्वितीय मानी जाती है।स्थानीय लोग बताते हैं कि इस स्थल पर बमबम बाबा सहित कई सिद्ध पुरुषों ने तपस्या की और यह स्थान तपोस्थली के रूप में भी प्रसिद्ध रहा है। हर वर्ष यहां मेले और धार्मिक आयोजन होते हैं, जिनमें हजारों भक्त शामिल होते हैं और आस्था की मिसाल पेश करते हैं।
वर्ष 1925 में यहां मेले की शुरुआत हुई और 1970 में जनपद पंचायत केसला ने इस स्थल को अपने अधीन लिया। 1971 में पार्वती महल का निर्माण कराया गया। आज भी यह स्थल न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि पर्यटन और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।आस्था, इतिहास और रहस्य से जुड़ा यह ‘तिलक सिंदूर’ शिवधाम सतपुड़ा की वादियों में विरासत और भक्ति का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है, जो श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
नर्मदापुरम जिले की सतपुड़ा वादियों में बसी प्राचीन तिलक सिंदूर शिवधाम की कहानी, जहाँ आस्था, इतिहास और रहस्य मिलकर श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचते हैं। यह स्थल न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि अपनी अनूठी परंपराओं और अद्वितीय शिवलिंग के कारण पूरे देश में जाना जाता है। हमारे साथ जुड़े रहने के लिए धन्यवाद, और ऐसे ही रोचक धार्मिक स्थलों की खबरों के लिए देखते रहें ।








