होली का त्यौहार तो देश भर में मनाया जाता है, रंगो और खुशियां की बौछार के साथ मगर मध्यप्रदेश के इंदौर में इससे होली के पांच दिन बाद रंग पंचमी पर हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है , जिसे गैर परम्परा कहते है यह सिर्फ एक होली मानाने का तरीका मात्र नहीं बल्कि शहर भर से और आस पास से सैकड़ों की संख्या में लोगो का एक साथ एकत्र होकर इस त्यौहार को खास बनाना है. इंदौर में रंगपंचमी की गैर करीबन 300 सालो से चली आ रही है यह एक जीवंत परंपरा है। यह केवल रंगों का त्यौहार नहीं, बल्कि मालवा की सांस्कृतिक आत्मा, मराठा शौर्य और सामाजिक एकता का प्रतीक है।
गैर एक ऐतिहासिक परम्परा
इंदौर में परम्परगत गैर की शुरुआत मल्हार राव होल्कर के समय से मानी जाती है। जब मराठा साम्राज्य ने मालवा क्षेत्र में अपनी सत्ता स्थापित की, तब सैन्य विजय और सामाजिक उत्सव साथ-साथ चलते थे। रंगपंचमी पर सैनिक और नागरिक एक साथ निकलते थे ढोल, नगाड़ों और रंगों के साथ। इसे मराठा शौर्य के प्रदर्शन और सामाजिक एकता के उत्सव के रूप में देखा जाता था। बाद में अहिल्याबाई होल्कर के शासनकाल में इस परंपरा को और व्यवस्थित और सांस्कृतिक स्वरूप मिला। उनके समय में धार्मिक और सामाजिक आयोजनों को संरक्षण मिला, जिससे गैर एक भव्य लोक-उत्सव बन गई।
अब गैर पहले से कहीं अधिक भव्य रूप में निकलती है
आयोजन की जिम्मेदारी नगर प्रशासन और सामाजिक संगठनों के हाथ में होती है। सुरक्षा, बैरिकेडिंग और व्यवस्थाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। हजारों लोग देश-विदेश से इसे देखने आते हैं।
मुख्य अनुष्ठान आयोजित होते है जैसे सुबह से ही राजवाड़ा क्षेत्र में जमावड़ा, ढोल-ताशों की शुरुआत, झांकियाँ और सांस्कृतिक दल,रंगों की वर्षा, शाम तक पूरे शहर में उत्सव का माहौल
गैर अब केवल इंदौर तक सीमित नहीं रही मालवा क्षेत्र के कई शहरों में यह परंपरा मनाई जाती है, लेकिन इंदौर की गैर सबसे प्रसिद्ध और भव्य मानी जाती है।








