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जयपुर शहर यानि पिंक सिटी भारत भर में अपनी संस्कृति और परम्परों के लिए खास जगह बनाये हुए है राजस्थान की राजधानी होने के कारण एक सम्पूर्ण राजस्थान की झलक आपको जयपुर में देखने को मिलेगी भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर से टूरिस्ट यहां आते है और अद्भुत संस्कृति और आतिथ्य में अपने आप को सराबोर कर जाते है. मगर जयपुर की होली में कुछ खास बात है गुलाल गोटा दो की न केवल दिखने में सुन्दर होता है बल्कि उतना ही मजेदार यह होली खेलने के लिए भी होता है.
क्या होता है गुलाल गोटा?
गुलाल गोटा एक छोटी, हल्की और खोखली गेंद होती है, जो लाख (प्राकृतिक रेज़िन) से बनाई जाती है। इसके अंदर सूखा रंग (गुलाल) भरा जाता है। जब इसे किसी पर हल्के से फेंका जाता है, तो यह टूटकर रंग बिखेर देता है। पहले के समय में लोग पानी की जगह इसी से होली खेलते थे। यह पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित माना जाता है क्योंकि इसमें प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं होता।

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कैसे शुरू हुई यह परंपरा?
इतिहास के अनुसार, गुलाल गोटा की शुरुआत लगभग 400 साल पहले हुई थी। माना जाता है कि जयपुर के संस्थापक सवाई जय सिंह द्वितीय के समय में राजघराने के लोग होली पर इसका इस्तेमाल करते थे।
शाही होली का आयोजन सिटी पैलेस में होता था, जहाँ राजा-महाराजा और आम लोग मिलकर त्योहार मनाते थे। राजस्थान में पानी की कमी होने के कारण सूखे रंग से होली खेलने की यह परंपरा शुरू हुई।

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कैसे बनाया जाता है गुलाल गोटा?
गुलाल गोटा बनाना आसान काम नहीं है। यह पूरी तरह हाथ से बनाया जाता है।
पहले लाख को आग पर गर्म करके नरम किया जाता है। फिर उसे गोल आकार देकर पतली खोखली गेंद बनाई जाती है।ठंडा होने के बाद उसके अंदर गुलाल भरा जाता है। अंत में उसे अच्छी तरह बंद कर दिया जाता है।
इसे बनाने में काफी मेहनत और अनुभव की जरूरत होती है।
आजकल बाजार में सस्ते और मशीन से बने रंग आसानी से मिल जाते हैं, जिससे गुलाल गोटा बनाने वाले कारीगरों की संख्या कम हो गई है। फिर भी होली के समय जयपुर के पुराने बाजारों में इसकी मांग बढ़ जाती है। पर्यावरण को बचाने के लिए लोग फिर से पारंपरिक और प्राकृतिक चीजों की ओर लौट रहे हैं, जिससे गुलाल गोटा की लोकप्रियता दोबारा बढ़ रही है।








